सजा के बाद बुर की चुदाई का मजा-2

(Saja Ke Baad Bur Ki Chudai Ka Maja- Part 2)

2017-10-23

स्मृति की बात सुन कर तो मेरी गांड फट गई… हवस गायब हो गई. मैं खुद को गालियाँ देने लगा.
सारी रात मुझको नींद न आई… पूरी रात मैं ऊपर वाले की मिन्नतें करता रहा कि मेरे उठने से पहले वो अपने घर जा चुकी हो.

घर के सभी लोग सुबह होने पर जागने लगे लेकिन मैं सोने का अभिनय करते हुये बिस्तर में पड़ा रहा. मुझको जगाने मम्मी आई, फिर बुआ आई पर मैं नींद का बहाना बना कर उठा नहीं.
नींद तो मुझसे कोसन दूर थी, मैं तो उस स्मृति के घर से जाने की प्रतीक्षा कर रहा था. लेकिन मेरे भाग्य में पता नहीं क्या बदा था, मौसी का अपने घर जाने का कार्यक्रम अचानक बन जाने से मम्मी ने स्मृति के पापा फोन करके कुछ दिन के लिए और रोक लिया.

अब तो मेरी और फट गई, मैं बदहवास हो गया, क्योंकि ऎसी बेइज्जती से तो मरना बेहतर है, मैं आत्महत्या का विचार मन में लाने लगा और ऐसे ही सोने के बहाने लेटा रहा.

दोपहर को स्मृति मेरे पास आई और मेरे कूल्हे पर पैर मार कर बोली- कब तक सोयेगा? चल उठ, नहा कर कुछ खा पी ले.
मैं करता भी तो क्या… कब तक लेटा रहता, वो तो अब कई दिन के लिए यहीं थी.

मैं उठा, नहाया, खाना खाकर बाहर घूमने चला गया! लेकिन बाहर भी यही भय सताता रहा कि कहीं उसने किसी को कुछ बता दिया होगा तो?
मैं घर लौट आया और छत पर जाकर स्मृति की हरकतों पर निगाह रखने लगा.
मुझे ऊपर देखा तो स्मृति मेरी मम्मी के पास जाकर कुछ बात करने लगी.

तभी मम्मी ने मुझे आवाज लगा कर बुलाया. अब तो मेरी बिल्कुल फट गई, मैं मम्मी को सिरदर्द का बहाना करने लगा पर मम्मी ने मुझे जोर से आवाज लगा कर बुलाया तो मैं नीचे उतर कर आया.
मम्मी के सामने पहुंच कर मैं घबरा गया और रोने लगा. मुझे रोटे हुए देख सभी सहानुभूति से पूछने लगे- क्या हुआ? रो क्यूँ रहे हो?
उनकी बातें सुन कर मुझे समझ आया कि स्मृति ने कुछ नहीं बताया… तो मैंने बात बदलते हुए कहा- दीदी की याद आ रही है.

मेरी बात सुन कर स्मृति मुस्काई और कमरे में चली गई तो मेरी जान में जान आई, मैं वापिस ऊपर वाले कमरे में पहुँच गया.
थोड़ी देर बाद वह मेरे पास आई और बोली- अच्छी नौटंकी की तुमने?

मेरी आँखें आँसुओं से भर गई… मैं बोला- तुम मेरे साथ जो करना चाहो कर लो लेकिन घर वालो को कुछ मत बताना!
उसने मुझे गौर से देखा, अपने दोनों हाथों से मेरे आंसू पौंछ कर कहा- चल मुंह हाथ धो ले!
और वापिस जाने लगी.

मैंने उस का हाथ पकड़ कर रोका और कहा- मुझे कुछ तो कहो?
वह बोली- बाद में बात करते हैं..
और चली गई.

उस समय मेरा डर तो काफी कम हो चुका था किन्तु मुझे बहुत आत्मग्लानि हो रही थी. मुझे लगा कि मैंने अपनी ज़िन्दगी की सबसे बड़ी गलती कर दी है.
यह सोचते हुए मन कुछ हल्का हुआ तो नींद आ गई.

शाम आठ बजे बुआ जी मुझे खाना के लिए बुलाने आई… किन्तु मैंने खाना खाने से मना कर दिया.

नौ बजे के करीब स्मृति खाने की प्लेट लेकर मेरे पास आई. उस समय मैं ऍफ़ एम् पर गाने सुन रहा था.

उसने मेरे सामने प्लेट रकही और कहा- खाना खा ले!
मैंने उससे भी खाना खाने से मना कर दिया और वहां से उठ कर जाने लगा. उस ने मेरा हाथ पकड़ा और बोली- तू खाना नहीं खाएगा तो मैं भी नहीं खाऊंगी.
मैंने रूक कर उसे पूछा- तुम खाना क्यों नहीं खाओगी?
वो बोली- तू मेरी वजह से भूखा रहे तो मैं कैसे खाना खा लूँ?

मैं कुछ बोलता उस से पूर्व वो मुझे अपने हाथ से खाना खिलाने लगी.
मैं स्मृति को खुश करने का अवसर नहीं खोना चाहता था, मैं भी उसको अपने हाथ से खाना खिलाने लगा.
यह भोजन मुझे इतना स्वादिष्ट लग रहा था कि क्या बताऊँ!

खाना समाप्त होने के पश्चात वह जाने लगी तो मैंने उससे यहीं सोने का आग्रह किया तो वह बोली- कुछ देर बातें करते हैं. फिर मैं नीचे जा कर सोऊँगी.

यहाँ कमरे में एक ही बिस्तर लगा था, हम दोनों इसी में दीवार की टेक लेकर बैठ गये.

कुछ घण्टे पूर्व जिस लड़की ने मुझे ज़लील किया था वही एक बार पुनः मेरे साथ बिस्तर में बैठी थी.
मैंने स्मृति को पिछली रात के लिए सॉरी बोला और दुख जताना शुरू किया तो वो मेरे मुखड़े को फूल की भाँति अपने हाथों में लेते हुये बोली- तू बहुत अच्छा है.
उस की आंखों में एक चमक थी.

मैंने भी उसका मुखड़ा अपने दोनों हाथों में लिया और कुछ पल ऐसे ही हम दोनों एक दूसरे को तकते रहे.
आओने वो कहावत तो सुन रखी होगी कि कुत्ते की पूंछ को बारह साल तक नलकी में रखो, तब भी सीधी नहीं होती.
यह कहावत मेरे ऊपर एकदम फिट बैठती है, गत रात्रि इतना सब होने के बावजूद मैं उसके मुखड़े को सहलाने लगा.

उसने मेरी ओर देखा तो मैंने उसके मुखड़े से हाथ हटा लिए. यह देख उसको हंसी आ गई, मैंने साहस करके दुबारा से उसके चेहरे को अपने हाथों में लिया और सहलाना शुरू कर दिया.
वो बोली- एक बात पूछूँ क्या?
मैं बोला- हाँ पूछो?
वह बोली- क्या तू मुझे सच में प्यार करता है?
तो मैंने उसे अपने गले से लगा कर कहा- कभी आजमा कर देख लेना!

मेरी बात सुन वह मुझ से लिपट गई.

मैं यह अवसर खोना नहीं चाहता था, मैंने सही वक्त देखा और उसके नर्म लबों पर अपने लब टिका दिए. अब उसकी ओर से कोई विरोध नहीं था, वह भी मेरा सहयोग करने लगी, उस पर भी कामुकता का नशा छाने लगा, उसने मेरे चेहरे को सहलाना शुरू कर दिया.

उसके लैब जैसे शहद में डूबे हुए थे, एकदम मधुर… रस वाले… नर्म… ऐसा मन कर रहा था कि उसके लबों को ही खा लूँ!
मैंने उसको अपनी बाजुओं में जकड़ लिया, वो भी मुझसे ऐसे कदर लिपट गई जैसे किसी वृक्ष से कोई लता लिपटी हो.

मैं गत रात्रि की सब बातें भूल कर उसके आगोश में खो ग़या था. वो भी मुझे बड़े ही प्यार से चूम रही थी. वो बुरी तरह से गरम हो रही थी. मैंने उसके शरीर से खेलना आरम्भ कर दिया. मैं कभी उसके गले को चूमता… कभी उसके गालों पर चुम्बन करता… कभी उसकी आँखों पर चूमता.
एक हाथ से मैं उसकी एक चूची को सहलाने लगा.

यही सब करते हुए हम दोनों बिस्तर पर लेट चुके थे और कभी वो मेरे ऊपर होती तो कभी मैं उसके जिस्म के ऊपर होता.
धीरे धीरे मेरा हाथ उस की योनि की ओर बढ़ा… तबी मुझे एकदम गत रात्री की याद आई.

कहावत है ना ‘दूध का जला छाछ भी फूँक फूँक के पीता है…’ इसी लिए जैसे ही मैंने उसकी योनि पर हाथ रखा, मैं एकदम रुक गया, उसकी तरफ देखने लगा तो वो पूछने लगी- क्या हुआ? रुक
क्यों गया?

मैं बोला- तुम्हारी अनुमति चाहिए.
तो वो मुस्कुराती हुई बोली- इस वक्त मैं सिर्फ तुम्हारे लिए आई हूं.

उसकी बात सुन कर मैंने उसकी दोनों चूचियाँ पकड़ कर मसल दी. वो पीड़ा से कराह उठी और मुझ से लिपट कर मेरे लबों को चूसने लगी. मैंने उसे इतना मस्त पहले कभी नहीं देखा था.

मैं उसके कामुक शरीर के एक एक अंग को सहला रहा था, कभी उसके गाल को सहलाता… कभी उसकी चूचियों को मसलता… कभी उसकी योनि को सहला देता तो कभी उसकी लम्बी चिकनी जांघों पर हाथ फिराता… मेरी बाजुओं में उसकी नाजुक कमर ऐसे बल खा रही थी जैसे नागिन बल खाती है.

दिसम्बर की ठण्ड में हम दोनों को पसीना आ गया. मैंने अब उसके कपड़े उतारना शुरू किया. पहले मैंने उस का स्वेटर उतारा… उसके बाद उस का टॉप उतारा.
उसने मैरून ब्रा पहनी थी और उस ब्रा में उसके गोरे चूचे बहुत सुन्दर लग रहे थे जैसे चांद के ऊपर लाल नीले बादलों का पहरा हो.

उसके बाद मैंने उस का लोवर उतारा तो देखा कि उसने उसी रंग की पेंटी पहनी थी… पेंटी के ऊपर से से ही उसकी फूली हुई योनि का अहसास हो रहा था.

इस समय स्मृति मेरे समक्ष केवल ब्रा पैंटी में थी, वो इतनी सुन्दर दिख रही थी कि मैं ब्यान नहीं कर सकता. उसकी नशीली आँखें… पतले लब… लम्बी गर्दन… उठी हुई चूचियाँ… पतली बल खाती नाजुक कमर… पतली लम्बी टांगें!

वह कयामत की हसीना लग रही थी… मैं उस पर भूखे पशु की भांति टूट पड़ा, कभी उसके रस भरे लबों को चूसता, कभी उसके गले को… तो कभी उसकी चूचियाँ मसलता, तो कभी उसकी योनि को सहलाता. तो कभी उसकी/ बुर में उंगली डाल कर अन्दर बाहर करता.

स्मृति पूरी गरम, उत्तेजित हो रही थी, सिसकारियां भर रही थी, मादक आवाजें निकाल रही थी- ऊह… ऊम्म… आहह… अईई… मर्र गईई… ओह ओ माँ मरर गईईई.
ये आवाजें मुझे और हैवान बना रही थी… मैंने उसके जिस्म पर दांतों से निशान बनाने शुरू कर दिये. मैंने उसकी जाँघों, कंधों पर दांतों से निशान बना दिये.

वो भी मस्ती भरे अन्दाज में उत्तेजित कर रही थी, वह कभी मुझे बाबू कहती तो कभी राजा… कभी जानम कहती… तो कभी प्रियतम… उसके बोल मुझमें जोश भर रहे थे और मैं अपनी हरकतों से उसके बदन की गर्मी बढ़ा रहा था.

अब वो आपे से बाहर होने लगी, मुझे कहने लगी- मेरी जान, प्लीज़, मुझको अब और ना तड़पाओ… प्लीज / चोद दो!
यह कहते हुये वो मेरे कपड़े उतारने लगी, उसने जल्दी जल्दी मेरे सारे कपड़े मेरे बदन से जुदा कर दिए.

जैसे ही उसने मेरी चड्डी उतारी, उसे मेरा खड़ा 6″ का लंड देखा, वह घबरा गई और मुझे आगे कुछ करने से मना करने लगी. तो मैंने उसे अपनी गोद में बैठा कर पुनः गरम करना शुरू किया. मैंने उसकी मैरून ब्रा पेंटी उतारी और उसकी एक चूची को मुँह में ले कर चूसने लगा.

कुछ ही पल में वह पुनः गरम हो गयी और चूत चुदवाने को मान गई.

अब मैंने देर करना सही नहीं समझा, उसको सीधी लिटाया और उसकी योनि पर लंड रगड़ने लगा. उसकी बुर पूरी गीली हो रही थी और लंड को योनि पर रगड़ने से लंड गीला हो गया.
मैंने लंड को योनि के छिद्र पर टिका कर हल्का सा धक्का लगाया तो लंड का सुपारा योनि के अन्दर घुस गया, योनि का छिद्र मेरे लंड पर रबर के छल्ले की भांति फंस गया.
किन्तु अब स्मृति ने मुझे रोका, बोलने लगी- यार, काफी दर्द हो रहा है.

मैं दो मिनट उसी अवस्था में रुका रहा और उसके गले और लबों को चूसता रहा. उसके बाद मैंने उसे पूछा- क्या अब भी दर्द महसूस हो रहा है?
तो वो बोली- अब ज्यादा नहीं है.

मैंने धीरे धीरे लंड को उसकी योनि में दो इन्च तक अंदर बाहर करना शुरू किया.

अब उसे भी मजा आने लगा, वो मेरे नीचे पड़ी मादक आवाजें निकालने लगी. सारा कमरा उस की सीत्कारों से गूंजने लगा. वो बड़बड़ा रही थी- मेरे सनम, मुझे अपनी बना लो… मुझे और मज़ा दो… मेरे जानम, मुझे खूब मज़ा दो… मेरे प्रियतम, मुझ में समा जाओ… मेरी जान, मेरी जान ले लो… मेरे महबूब मेरी चूत को फाड़ दो.

मैंने उसकी जोरदार चुदाई करने का यही वक्त सही समझा और मैंने लंड को पूरा बाहर खींच कर एक जोरदार धक्का मारा… 6″ का पूरा लंड उसकी नाजुक योनि को फाड़ते हुए उसकी गहराई में समाहित हो गया.

स्मृति की जोर की चीख निकली किन्तु मैं पहले ही सावधान था, जैसे ही चीखने के लिये उसका मुँह खुला, मैंने अपने एक हाथ से उसका मुँह बन्द कर दिया और उसकी चीख गले में दब कर रह गई.

उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे, वह मेरी पकड़ से छुटने का असफल प्रयास कर रही थी परन्तु मैंने उसे पूरी तरह से जकड़ा हुआ था. उसकी योनि से गरम रक्त निकल कर मेरे लंड से होता हुआ जांघों पर बह रहा था.

पांच मिनट बाद मैंने उसके मुख से हाथ हटाया तो वो मुझे गाली देती हुई कहने लगी- तुम बहुत गंदे हो!
मैंने प्यार से उसके मुखड़े को सहलाया, फिर समझाया- पहली बार में सभी को यह तकलीफ होटी है. अब धीरे धीरे आनन्द मिलना शुरू होगा तुम्हें!

कुछ मिनट तक मैं ऐसे ही उसके ऊपर लेटा रहा, फिर मैंने उसे पूछा- अब भी दर्द है क्या?
तो वो बोली- अब तो दर्द काफी कम है!

मैंने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू किये, पांच मिनट की हल्की चुदाई के बाद मैंने अपनी गति बढ़ानी शुरू की तो अब उसे भी मजा आने लगा, वो भी नीचे से सहयोग करने लगी. अब वो मादक आवाजें निकालने लगी- ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह… उन्ह… आअह्ह… उईईइ… मेरे सजन मुझे और जोर से चोद… मर्र गयी… मेरे जानम, मेरी चूत फाड़ दे आज… आह्ह… ओहहो… उम्म्म… अहह… हई… याह… उईई… क़र उह्ह्ह… आआअह्ह… बहुत मजा आ रहा है… मुझे तूने पहले क्यों नहीं चोदा मेरे सनम!

मैं भी उसकी हर बात का उत्तर अपने लंड के झटके से लगातार दे रहा था और उसे अपनी बातों से गर्म भी कर रहा था. मैं उससे कह रहा था- मेरी जान, छम्मक छल्लो, मैं तेरे लिए कब से पागल हो रहा था, आज जा कर तू मेरे लंड के नीचे आई है… आज तेरी चूत को फाड़ कर रख दूँगा… मेरी जान, तू बस मुझे ऐसे ही चुदाई करवाती रहना, मैं तुझे रोज ज़न्नत की सैर करवाऊँगा.

चुदाई अपने चरम पर थी, मैं अपने 6″ के लंड को बाहर खींच कर एक ही झटके में पूरा अन्दर घुसा देता और मेरे लंड के प्रहार से स्मृति कराहने लगती.
दोनों ओर से पूरा जोश था… वो मेरी पीठ पर अपने नाखून गड़ा रही थी, मेरे कंधों पर दांतों से काट रही थी.
मैं भी उसके कंधों और चूचियों पर काट रहा था. उसकी चूचियों पर कोई जगह ऐसी नहीं थी जहाँ मेरे दांतों के निशान ना हों.

मेरा लंड उसकी चूत को एकदम फंस कर चोद रहा था, वह भी अपनी पहली चुदाई का पूरा आनन्द उठा रही थी… वो अपनी टांगें मेरी कमर से लपेटे हुए थी और उसने अपनी बांहें मेरे गले में डाल रखी थी… हम दोनों के लैब एक दूसरे से लम्बे समय के लिए चिपके रहते… कभी वह मेरी जिह्वा को अपने मुख में लेकर लॉलीपॉप की भांति चूसने लगती तो कभी मैं उसकी जिह्वा को अपने मुख में लेकर टॉफी की भांति चूसने लगता.
उसकी सांसों से बहुत ही मधुर सुगंध आ रही थी… वह कामदेव की पत्नी रति लग रही थी.

मेरा लंड उसकी योनि को ऐसे चोद रहा था जैसे इंजन के सिलेंडर में पिस्टन चल रहा हो. पूरा कमरा उसकी / की चुदाई की आवाजों से गूंज उठा था.

काफी लम्बी चुदाई के बाद स्मृति ने कहा- यार, कुछ हो रहा है मुझे…
उसका जिस्म अकड़ने लगा था यानि वो अब झड़ने की कगार पर थी.
मैंने कहा- मेरी जान, अब तुम सेक्स के परम आनन्द की प्राप्ति करने वाली हो!

मैंने अपने झटकों की गति बढ़ा दी और कुछ धक्कों के पश्चात मेरा भी वीर्य निकलने को था, मैंने उसे पूछा- जान, मेरा भी साथ ही निकलने वाला है… कहाँ निकालूँ?
उसने कहा- मेरे अन्दर ही निकालना!

मैंने चुदाई की गति और बढ़ा दी, 10-12 झटकों के बाद हम दोनों ने एक साथ परम आनन्द को प्राप्त किया.

कुछ देर मैं उसके जिस्म पर लेटा रहा, उसके लबों को चूसता रहा.
जब मैं उसके बदना के ऊपर से उतारा और उसकी योनि से लंड बाहर निकाला तो उसमें से मेरा वीर्य और खून मिल कर बाहर आने लगा.

उसकी योनि सूज कर और फूल गई थी और गोरी चूचियों का रंग गुलाबी से लाल हो गया था.

इस क्रिया में मुझे इतना आनन्द आया कि इसके आगे ज़न्नत का सुख भी कुछ नहीं. मैंने एक कुंवारी अक्षतयौवना को औरत बनाया और उसकी बुर को फाड़ कर चूत बना दिया.

अब वह मुझसे लिपट कर बोली- जानम, मुझे छोड़ कर तो नहीं जाओगे?
मैंने कहा- पगली, तू तो मेरी जान है, जब चाहे जहाँ चाहे बुला कर देखना, दौड़ा चला आऊंगा.

अब मैंने उसे पूछा- जान एक बात बता… अगर तू मुझसे प्यार करती थी तो पिछली रात गुस्सा क्यों हुई थी?
स्मृति बोली- यार, मेरी बगल में वो मधु जागी हुई थी.
इसके बाद स्मृति सात दिन हमारे घर में रही और हर रात वो उसी ऊपर वाले कमरे में मुझ से चुदाई करवाती. उसके बाद भी जब वो अपने घर चली गई तब भी जब मेरा दिल करता, या उसका दिल करता तो मुझे फोन करती, हम जैसे भी करके अपना जुगाड़ बना ही लेते!

चुदाई का यह सिलसिला तीन साल तक चलता रहा. इसके बाद उसका भी विवाह हो गया लेकिन विवाह के बाद अब भी वह मुझ से चुदती है, उसका एक बेटा है जो वो कहती है कि मेरे लंड की चुदाई से हुआ है.
अब भी जब भी अवसर मिलता है, हम दोनों डो जिस्म से एक जिस्म हो जाते हैं.

मित्रो, आपको मेरी यह रोमांचक सेक्स स्टोरी कैसी लगी, मुझे अवश्य बताइएगा, मुझे आपके कमेंट्स की प्रतीक्षा रहेगी.
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