रीटा की तड़पती जवानी-9

(Rita Ki Tadapti Jawani- Part 9)

2011-03-24

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आपने मेरी इंडियन सेक्स स्टोरीस के आठ भाग पढ़े.
बहादुर ने रीटा की जवानी का पोर पोर चटका दिया था, रीटा की चूत का नक्शा बिगाड़ दिया था.
अब आगे-

रोज सुबह बहादुर अपने निराले लण्ड पर पानी से भरी बाल्टी उठा कर लण्ड को और भी बलवान बना लिया था. बहादुर की आँखों में हर वकत चूत का खुमार रहता था.

बहादुर गाँव की ठरकी लड़कियों की संगत में पड़ कर महान चोदू बन गया था. बहादुर की चोदी हुई लड़की को बहादुर से चुदवाये बिना चैन नहीं पड़ता था. बदमाश बिल्लो, गुन्डी गुलाबो, जालिम जुबेदा, चिकनी चमेली, लरजाती लाजो, रन्डी रानी, सुडौल सबीना, छुईमुई छमिया, शानदार शिल्पा, निगोड़ी निम्मो, अनाड़ी अनारो और शरारती शब्बो आदि कई लड़कियाँ अब भी बहादुर के लण्ड के गुनगान गाते नहीं थकती थी. गाँव की सारी टाप क्लास चूतों के पट्टे बहादुर के आलीशान लण्ड के नाम थे.

खेत में मूतती लड़कियाँ बहादुर की खास कमजोरी थी. सुबह सैर करते करते बहादुर खेतों में एक-आधी को चोद ही आता था. कई लड़कियों को बहादुर गन्ने के खेतों में गन्ने चुसाने के बहाने ले जाकर अपना लण्ड चुसा डलवाता था. और तो और बहादुर ने गाँव के छोटे चिकने लड़कों को भी नहीं बख्शा था.

बहादुर का बड़ा भाई गाँव में बदमाश दरोगा था. दरोगा नम्बर एक का खतरनाक गाण्डू था. हर एक अपराधी की गाण्ड मार कर ही हटता था, इसीलिये कोई बहादुर की हरकतों के बारे में कुसकता भी नहीं था.

करीना और अधनंगी कैटरीना कैफ का शीला वाला ठरकी डाँस देख बहादुर मस्त लण्ड को शहर की येंक्की और नशीली चूतें भी चखने के लिये बेताब हो गया. शहर जाकर बहादुर ने सबसे पहले अपनी मकान मालिक की नठखट नेपालन नौकरानी पारो को रगड़ा.फिर सैक्सी मकान मालकिन अलका और पड़ोसन तमन्ना को भी नहीं छोड़ा.

फ़्लैशबैक की तरह पारो की जवानी बहादुर की आँखों के समने घूम गई. पारो का अंग अंग अलग अलग उसके जिस्म पर कसा था और हर चीज़ कुछ ज्यादा ही बड़ी थी. जवान पारो की मोटी मोटी कजरारी आँखें और चित्तोड़गढ़ से चूतड़ तो देखते ही बनते थे. चूच्चे ऐसे थे जैसे परकार से खींचे गोले, हर वक्त पारो गहनों से लदी और सज़ी संवरी रहती थी.

दूसरे ही दिन दुपहर को बहादुर जब पेशाब करने बाहर निकला तो उसने पारो को अलका के कमरे के अंदर चुपके चुपके झांकते हुए देखा. पारो किसी कुत्तिया सी हाँफती हुई अपना हाथ से जोर जोर से अपनी चूत को घाघरे के ऊपर से ही रगड़ रही थी. थोड़ा सा और झुकती तो शायद पारो के थरथराते चुच्चे उसकी अंगिया से बाहर ही आ जाते.

मौके का फायदा उठा कर बहादुर ने जब झुकी हुई पारो के उचके हुए चूतड़ों पर हाथ फेरा तो पारो चिहुंक कर खड़ी हो गई और अपनी चुच्चियों पर हाथ रखती फुसफुसाती बोली- दय्या रे दय्या, तूने तो मुझे डरा ही दिया था!

बहादुर हाँफती पारो के फूलते पिचकते चूच्चों को घूरता बोला- यह क्या कर रही थी तुम?

‘शऽऽऽऽ चुप!’ चुलबुली पारो बहादुर को चुप रहने का इशारा कर खींच कर कोने में ले गई और पंजों के बल उचक कर अपनी छातियाँ बहादुर के सीने से गाड़ती बहादुर के कान में बोली- अंदर अलका आंटी और तमन्ना दीदी उलटी सीधी बातें कर रही हैं.

बहादुर ने चंचल पारो के चूतड़ों को सहला कर मसल कर पूछा- उलटी सीधी बातों से क्या मतलब?

पारो अपने पाईनएप्प्लों से चुच्चे को बहादुर के सीने में जोर से गाड़ती, आँखों में आँखो डाल कर अर्थपूर्ण स्वर में बोली- मर्द औरत के बारे में तो सुना था, पर एक औरत औरत की कैसे ले सकती है?

बहादुर समझ गया कि कमरे में क्या हो रहा है. बहादुर पारो के तरबूज से रसभरे चूतड़ों को हाथों से चोड़ाता बोला- मेरी रानी, मेरे कमरे में चल तो बताता हूँ कि एक औरत दूसरी औरत की कैसे ले सकती है.

खेली खाई पारो अपने गालों पर हाथ रख खुशी से बच्चों की तरह उछलती और दबी आवाज में बोली- हाय मांऽऽऽ! क्या तुम्हें ये सब पता है?

बहादुर पारो के बिना बरेजरी के स्तनों को ज़ोर ज़ोर से खींचता बोला- तू मुझे मर्द औरत के बारे में बताना और में तुझे औरत औरत के बारे बता दूँगा. तू मेरे कमरे में पहुँच, मैं पिशाब करके आया. यह कहानी आप अन्तर्वासना.कॉम पर पढ़ रहे हैं.

चिकनी पारो चुच्चे पटवाती हुई अपनी जांघों में बहादुर के खडे लण्ड को रगड़ती और बहादुर के खम्बे से लम्बे लण्ड को हसरत भरी निगाहों से देख बोली- सीऽऽऽ! तुम्हारा बादशाह तो बहुत शरारती है, जरा जल्दी आना मेरे राजाऽऽऽ! तुम्हारे बादशाह ने तो मेरी बेगम का दिल मोह लिया है.

पारो शहर के खस्सी और निकम्मे नामर्द लोगों से चुदवा चुदवा कर बुरी तरह से बोर हो चुकी थी.

चुलबुली पारो मुड़ी और बल खाती नागिन सी अपने फुटबाल से चूतड़ों को ठुमक ठुमक मटकाती बहादुर के कमरे की तरफ चल दी.डोरी वाली चुस्त चोली से पारो की नंगी मरमरी पीठ और कमर चमक रही थी. नीचे घुटनों तक घाघरे से झांकती खूब सुडौल पिंडलियाँ और पैरों में चांदी की पाजेब छन छन कर रही थी. ऊपर से पारो की लम्बी चोटी थिरकते चूतड़ों के बीच घड़ी के पैण्डूलम सी दायें-बायें उछलते देख बहादुर को लण्ड की रीड की हड्डी में सिरहन सी दौड़ गई.

बहादुर ने जाते जाते कमरे में झाँक कर देखा तो तमन्ना और अलका आपस चिपटी हुई सीऽऽ सीऽऽ कर एक दूसरे को बुरी तरह से चूम चाट रहीं थी. खूबसूरत अलका की गुलाबी साड़ी कमर तक उठी हुई थी और बलाउज चौड़ चपाट दरवाजे सा खुला हुआ था. अलका के गुलाबी तोतापुरी आम ठरक से खूब अकड़े हुए और हज़ार वाट के बल्बों की भान्ति जगमगा रहे थे.

तमन्ना ने हल्के हरे रंग का सलवार और कमीज़ पहन रखी थी. तमन्ना ने टांगों को चौड़ा कर रखा था और अलका सलवार के ऊपर से ही तमन्ना की चूत को अपने मुँह में चुमहला रही थी.

फिर अचानक ही अलका ने तमन्ना की सलवार का नाड़ा खींच डाला और तमन्ना की चिड़िया को नंगा कर दिया. तमन्ना की कंवारी दूधिया चूत ने कमरा और भी रोशन कर दिया.

बहादुर ने सोचा कि अभी तो पारो का तन्दूर पराँठे सेकने को तैयार है. बहादुर का लण्ड पारो की मस्त जवानी को चखने के लिये बेताब था. बहादुर की आँखों के सामने पारो की मोटी कजरारी आँखें और शानदार चूतड़ घूम गये.

बहादुर कमरे में घुसा तो पारो ने लपक के दरवाजा बंद कर दिया दरवाजे से पीठ चिपका कर खड़ी पारो ठरक से हाँफतीं सी बहादुर के पायजामे के उभार को ललचाई नजरों से देख रही थी. पारो का पल्लू सीने से सरक गया और पारो की दिलकश चालीस डी छातियों ने पारो की चुस्त अंगियाँ की माँ को चोद के रखा हुआ था. चुदास मस्ती में पारो की आँखों में वासना के शरारे बरस रही थी और रह रह कर पारो अदा से अपने नीचे के रसीले होंटों को काट रही थी.

पारो अपनी जाघ से जांघ रगड कर अपनी चुलबुली चूत को शांत करने की नाकाम कोशिश करती अपनी चूत को साड़ी के ऊपर से सहला कर और मस्त अंगडाई मारी तो बहादुर का लण्ड पायजामे के अन्दर ही 45 के एन्गल पर अकड़ गया. पारो जैसे आँखों ही आँखों में घोल कर पी जाने वाली नजरो से देखती बोली- तो फिर हो जाये प्यार मुहब्बत का सिलसिला?

बहादुर ने पारो के इकहरे बदन को बाहों में दबोच लिया और पारो की अंगिया के धागे खोलने लगा. धागे खुलते ही पारो की अंगिया सप्रिंग को समान उछल कर अलग हो गई और पारो के दोनों मदमस्त कबूतर उछल कर बहादुर के हाथों में आ गये. पारो का कमरबन्द ढीला हो गया और पेटीकोट ने पारो के पैरो में मरी चिड़िया की तरह दम तोड़ दिया.

बहादुर ने पारो के लावारिस बदन को बांहों में उठा कर बैड पर पटका तो पारो की आँखें उन्माद में ऊपर की और लुढ़क गई.

पारो के जिस्म पर ज़ेवर के अलावा एक धज्जी भी नहीं थी, पारो का हुस्न टपके आम के समान भरपूर जवान और रसीला था. अब बिस्तर पर पारो का आवारा शवाब लाहपरवाही से बिखरा और फलौरौसैन्ट लाईट में जगमगा रहा था.

चांदी के गहनों झूमर, झुमके, नथनिया, हार, चूड़ियाँ, मुंदरियाँ, बिच्छवों से लदी फदी पारो अप्सरा सी लग रही थी.

बहादुर ने भी अपने कपड़े उतारे तो पारो ने बहादुर के अजूबा लण्ड को देख खुशी से चिल्ला सी पड़ी- आईऽऽऽऽ बाप रे बाप हायऽऽऽ राजा लगता है कि आज मेरी छोटी पारो के चिथड़े होंगें!

पारो भी खूब गीली और बैड कबड्डी खेलने को बथेरी उतावली थी. बहादुर ने पारो की गाण्ड को थोड़ा बाहर खींच कर चूतड़ों के नीचे सिरहाना रखा तो पारो की रानी पूरी तरह से उभर कर बाहर आ गई पारो की भौंसडी खूब ज्यादा मोटी और रसभरी थी और चूत के अंदर के पत्ते दो दो इन्च बाहर लटके हुऐ फूल की पखुड़ियों के समान कंपकपा रहे थे.

पारो ने एक हाथ से अपनी दो ऊँगलियाँ चूत पर रख कर अंगुलियों का उलटा ‘वी’ बना कर गुलाबी भौंसडी को चौड़ा दिया और दूसरे हाथ से बहादुर के हट्टे-कट्टे लफन्डर लण्ड को पकड़ कर खींच कर अपनी चूत के चीरे से सटा दिया. दहकते लण्ड की गर्मी पाकर पारो की धधकती चूत ताज़ा खुले सोडे की बोतल समान बिफर कर झाग छोड़ने लगी.

बहादुर ने एक झटके से ही अपना लोकी सा लण्ड पारो की फूलगोभी सी चूत में घुसेड़ दिया तो पारो कराह कर बोली- आहऽऽऽ! अरे मेरे यार, तेरा लण्ड है या कुतबमीनार! हायऽऽऽ चोद मेरे माईया चोद उफ रेए, आज किसी मादरचोद से पाला पड़ा है, सीईईई ले राजा पाड़ के रख दे अपनी पारो को!

यह कह कर पारो अदा से अपने पांव के अंगूठे पकड़ लिये.

फिर बहादुर ने पारो की चुच्चों की टोटनी को चुटकी में लेकर अपने लण्ड से प्यासी पारो की पिनपिनाती चूत के पसीने छूटा दिये. कमरे में चुदती पारो की घुटी घुटी चीखों, चूड़ियों और पाजेबों की खनखनाहट, सिसकारियों और किलकारियों की कामुक आवाजें आने लगी. पारो पारो न रही और बहादुर बहादुर न रहा.

कई हफ़्तों से चूत का सताया हुआ बहादुर पूरी दोपहर जबरदस्ती पारो की आगे पीछे से बार बार लगातार मारता रहा तो पारो की बस हो गई. अधमुई सी पारो जैसे तैसे बहादुर को झेलती चली गई. बहादुर ने पारो की भौंसडी और गाण्ड के परखच्चे उड़ा दिये थे. बहादुर ने पारो की चूत को चोद कर चित्तोड़गढ़ बना डाला था.

लुटी पिटी चुदी और ठुकी पारो लंगड़ाती और लड़खड़ाती अपने कमरे में पहुँच कर ढेर हो गई.

स्कूल पास आ गया तो रीटा बोली- अच्छा बहादुर, कल सुबह जरा जल्दी आ जाना! सुबह मेरी चोदम-चुदाई की एक एकस्ट्रा क्लास है.
बहादुर फुसफुसाता सा बोला- परंतु बेबी, तुम्हारी तो फट चुकी है?

‘ओह, कम आन बहादुर, अभी मेरी पिछली पड़ोसन तो अभी एकदम तन्दरूस्त और तरोताजा है.’ शरारती रीटा ने मुस्कुरा कर आँख मार कर अपने रसीले होंट को हल्का सा उचका कर सायलन्ट किस मार कर पलटी और चूतड़ मटकाती हल्के से लंगडाती सी स्कूल के गेट की तरफ चल दी.
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