अगस्त 2017 की बेस्ट लोकप्रिय कहानियाँ

(Best and Popular Hindi Sex Stories Published In August 2017)

2017-09-27

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प्रिय अन्तर्वासना पाठको
अगस्त 2017 में प्रकाशित हिंदी सेक्स स्टोरीज में से पाठकों की पसंद की पांच बेस्ट सेक्स कहानियाँ आपके समक्ष प्रस्तुत हैं…

यह हॉट सेक्स स्टोरी मेरी और मेरी चाची की बेटी यानि मेरी चचेरी बहन की चुदाई की है। वो मुझसे नौ साल छोटी थी हॉट स्टोरी पढ़ कर मजा लें!

मैं चाची के घर में रहता हूँ। मेरी चचेरी बहन गौरी अभी 18 वर्ष की है। मैंने कभी से गलत नजरों से नहीं देखा था लेकिन जब से मैंने अन्तर्वासना की चुदाई की कहानी पढ़ी, तबी से मुझे हरेक लड़की की चुदाई का मन होता है।

गौरी मुझसे छोटी है.. पर अभी से उसकी चूची संतरे से भी बड़ी हो गई हैं, उन्हें देखकर गौरी की चुदाई का मन करता था। मैंने गौरी की चुदाई से पहले भी उसकी चूची किसी ना किसी बहाने से दबाई हैं।

है तो वो छोटी सी चूत वाली पर मैं अपनी बहन की छोटी सी चूत का दीवाना था। मुझे हर कीमत पर उसकी चूत लेनी थी क्योंकि उसके शरीर से लगता था कि यह है तो छोटी.. पर मेरा लंड अवश्य झेल लेगी।

एक बार मैं अपने दोस्त के घर सोया. रात में मैं पेशाब करने उठा तो उसके मम्मी पापा के कमरे की खिड़की से उन दोनों की चुदाई देखी.

अंधविश्वास का फायदा उठाकर चूत चुदाई करना बहुत आसान है, मैंने अपने शैतानी दिमाग से अंधविश्वासी आंटी, भाभी, लड़कियों को चोदने का एक फ़ॉर्मूला निकाला है.

मैं सोना आप सबके लिए बीवी की चुदाई की यह नई कहानी लेकर आई हूँ, आशा है आपको मेरी यह कहानी भी मेरी पिछली कहानियों की भांति खूब पसंद आयेगी।

आप सब ने मेरी पिछली कहानियाँ तो पढ़ी ही हैं कि किस तरह मैंने एक घरेलू महिला से एक इंसेस्ट क्वीन बनने का रास्ता तय किया.
मैं आप सभी पाठकों से निवेदन करती हूँ कि मेरी इस कहानी को पढ़ने से पूर्व आप अवश्य पढ़ें।

मैं सोनाली, मेरे पति रवि एक प्राइवेट कम्पनी में काम करते हैं और हर महीने टूअर के लिए कुछ दिन घर से बाहर ही रहते हैं।
मेरे दो बच्चे हैं, बड़ा लड़का रोहन है अठारह साल का और मेरी बेटी अन्नू उससे दो साल छोटी है।

यह कहानी स्नेहा जैन की है जो मेरे मोहल्ले में रहती थी. हमारे मोहल्ले में एक से बढ़ कर एक भरपूर जवानियाँ और खिलती कमसिन कलियाँ हैं.

स्नेहा जैन मेरे ही सामने पैदा हुई, खेलते खेलते बड़ी हो गई, वो नाक बहाती मैली कुचैली सी लड़की कब ‘माल’ में परिवर्तित होती चली गई… वक्त का पता ही नहीं चला.
बारहवीं में आते तक वो हाहाकारी जिस्म और हुस्न की मलिका बन चुकी थी जिसके मदमस्त यौवन के किस्से गली चौराहों में चलने लगे थे.

वो सायकिल से स्कूल जाती तो अपने सीने के गदराये हुये अंगों को निष्ठा पूर्वक दुपट्टे से ढक लेती लेकिन वे कहाँ छिपने वाले थे, किसी के भी कभी नहीं छिपे, सड़क पर जरा ऊंच नीच होने से साइकिल जम्प लेती और वो कबूतर ऊँची उड़ान भरने लगते.

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