मोहल्ले की जान

(Mohalle ki Jaan)

2018-02-10

दोस्तो, मेरा नाम रशीद है, मैं लखनऊ में रहता हूँ। आज मैं आपको एक बहुत ही ज़बरदस्त कहानी बताने जा रहा हूँ।
दरअसल बात यह है कि मैं अभी सिर्फ 18 साल का हूँ, और मैंने कल पहली बार सेक्स किया। हमारी मोहल्ले की जान सकीना बाजी के साथ।
सकीना बाजी की उम्र इस वक़्त 55 साल है, मगर आज भी वो अपने आप को बहुत सजा संवार के रखती है, उम्र से कम दिखती है, जिस्म बहुत ही भरपूर है।

खास बात ये है कि हमारे मोहल्ले के करीब करीब हर मर्द ने कभी न कभी सकीना बाजी को चोदा है। इसी लिए वो मोहल्ले की जान कही जाती है। 55 की उम्र में भी सकीना बाजी के रंग दूध सा गोरा, जिस्म ढलक गया है, मगर कपड़े बहुत शानदार पहनती है, हार्ड ब्रा पहन कर अपने मम्मे वो एकदम सीधे खड़े रखती है, दुपट्टा कम ही लेती है। साड़ी हो या सूट हो, गले थोड़े गहरे ही पहनती है, बड़े बड़े क्लीवेज शरे आम ही दिखते हैं, और अगर कोई उसके क्लीवेज को घूरता भी है, तो वो कभी बुरा नहीं मानती।
लंबा चौड़ा पठानी जिस्म है। पूरा मेक अप करके रखती है इसलिए सुंदर बहुत लगती है। हमारे मोहल्ले के शायद ही कोई नौजवान ऐसा होगा, जिसने सकीना बाजी के अलावा किसी और से अपने सेक्स जीवन की शुरुआत की हो। यहाँ तक के हमारे अब्बा लोग भी अपना उदघाटन वहीं से करवा कर आए थे।

जिस दिन मैंने अपना उदघाटन करवाना था, मेरी फूफी के लड़के ने सकीना बाजी से बात करी। वैसे उसके घर में और भी लड़कियां थी, जो जिस्म फरोशी का काम करती थी, मगर सकीना बाजी उन सब पर भरी पड़ती थी। मैं और मेरी फूफी का लड़का, हम दोनों सकीना बाजी के घर गए। जब हम उसके घर पहुंचे तो वहाँ और भी कई लोग थे, कुछ तो हमारे ही मोहल्ले के कुछ बाहर के भी थे।
मेरे फूफी के लड़के काशिफ ने सकीना से बात की कि नए लौंडे का उदघाटन करवाना है आपसे।
सकीना बाजी ने मेरी तरफ देखा और बोली- क्यों रे, किसका लौंडा है?
मैंने कहा- शाहिद जमाल का!
वो मुस्कुराई और बोली- अरे तू तो अपना ही बच्चा है, तेरे बाप का रिबन भी मैंने ही कटवाया था, तेरे चाचा का, ताऊ का, मामा का, तेरे तो पूरे खानदान को नंगा देखा है मैंने!

उसकी बात सुन कर आस पास खड़े सब लोग हंस पड़े, मगर मुझे बड़ी शर्म सी आई।
वो बोली- अरे शरमाता क्यों है, अब तू जवान हो गया, लुल्ली सर उठाने लगी, तो डर काहे का।

उसकी बात से मैं और शर्मा गया। उसने इशारे से मुझे अपने पास बुलाया, और बोली- देख यहाँ और भी बहुत सी लड़कियां है, कोई और पसंद है तो देख ले।
मैंने कहा- नहीं जी, आपसे ही करूंगा।
वो बोली- अरे मैं तो तेरी दादी की उम्र की हूँ। मुझमें क्या मिलेगा तुझे?
मगर मैंने फिर भी उसके बड़े बड़े मम्मे देखते हुये कहा- नहीं बाजी, आपसे ही करूंगा।
वो बोली- चल आ फिर, अंदर चल के करेगा, या यहीं करेगा?
मैं बड़ा शरमाया- जी अंदर चल कर।

वो मेरे हाथ पकड़ कर अंदर ले गई। अंदर जा कर वो बेड पे बैठ गई, मैं दरवाजा बंद करने लगा तो वो बोली- अरे रहने, सारे शहर ने मुझे नंगी देखा है, अब किस से पर्दा करना।
मैंने कहा- मुझे प्राइवेसी चाहिए।
मैंने दरवाजा बंद किया और सकीना बाजी के बगल में जा कर बैठ गया और उसके बड़े से क्लीवेज को देखने लगा।
वो बोली- क्या देखने ही आया है? चल कपड़े उतार!
कह कर वो अपनी कमीज़ उतारने लगी।

कमीज़ बहुत टाइट थी तो मैंने हेल्प करके उसकी कमीज़ उतरवाई। नीचे काले रंग का ब्रा, गोरे जिस्म पे बहुत ही फब रहा था। मैंने भी अपनी शर्म उतार फेंकी, और एक मिनट में ही अपने सारे कपड़े उतार कर नंगा हो गया।

सकीना बाजी ने अपनी खोला और लेट गई। मैंने आगे बढ़ कर सकीना बाजी की सलवार सारी की सारी उतार दी। चड्डी नहीं पहने होने के कारण वो नंगी हो गई। बूढ़ी फुद्दी, मगर फिर भी उसने शेव कर रखी थी, एक भी बाल नहीं था, बगलें भी बिल्कुल साफ।
उसने अपना ब्रा भी उतार दिया। पहली बार इस उम्र की औरत मैंने बिल्कुल नंगी देखी थी, इस उम्र की क्या, पहली बार कोई औरत नंगी देखी थी।

मैं उसकी बगल में लेट गया और उसके मम्मों से खेलने लगा। उसने खुद एक मम्मा मेरे मुँह से लगाया- ले पी इसे, तेरे दादा से लेकर तुम तक, तुम्हारी तीन पीढ़ियों ने इस जिस्म से खेला है।
मैंने हैरान हो कर पूछा- मेरे दादा भी?
वो बोली- हाँ, ** साल की थी, जब इस शहर में इस धंधे में आई थी, तब के शुरुआती ग्राहकों में से एक तेरा दादा भी था। फिर तो तेरे घर से याराना ही हो गया। उसके बाद तो शायद ही तेरे घर का कोई मर्द होगा, जो मेरे ऊपर से न गुज़रा हो।
वो जैसे किसी पुरानी यादों में खो गई।

मैं उसके गोरे गोरे मोटे मम्मों को दबा दबा कर चूस चूस कर मज़े लेने लगा। थोड़े झुर्रीदार और लटके हुये मम्मे थे, मगर औरत का जिस्म तो औरत का ही होता है, हर उम्र में मर्द को आकर्षित करता ही है।
मैंने पूछा- बाजी, लंड चूसोगी?
वो बोली- क्यों नहीं मेरी जान, तेरे बाप दादा का चूसा है, तो तेरा नहीं चूसूँगी?
और मेरे बिना कहे उसने उठ कर मेरा लंड पकड़ा और अपने मुँह में लेकर चूसने लगी। पूरे मज़े दिये उसने मुझे, कुछ देर चूस कर बेड के नीचे से एक कोंडोम का पेकेट निकाला और एक कोंडोम खोल कर मेरे लंड पर चढ़ा दिया और मेरे चूतड़ पर हल्की सी चपत मार कर बोली- चल आ जा ऊपर, देखूँ, तेरे बाप दादा वाला दम तेरे में भी है या नहीं।

मैं उसके ऊपर लेटा तो उसने मेरा लंड पकड़ कर अपनी चूत पर रखा और रखते ही मेरा लंड उसकी बूढ़ी चूत में घुस गया।
‘आए’ करके वो बोली।

मुझे पता था कि इसे कोई दर्द नहीं हुआ, मगर बस वो रंडी वाले चरित्र करके दिखा रही थी। मैंने करीब 8-9 मिनट उसकी चुदाई की और वो “हाय, ऊई, मैं मरी, हाये माँ” और पता नहीं क्या क्या बोलती रही, जैसे मेरे चोदने से उसे बहुत दर्द हो रहा हो।
जब मैं झड़ गया तो मैंने उस से वैसे ही पूछ लिया- बाजी, आप तो बहुत टाइम से इस धंधे में हो, क्या मैं जान सकता हूँ कि आप कैसे और कब इस धंधे में आई?
वो बोली- क्यों रे, तू क्या मुझपे फिल्म बनाएगा?
मैंने कहा- अरे नहीं, मैं आप पे एक कहानी लिखूंगा।
वो हंसने लगी- मेरी कहानी कौन पढ़ेगा?
मैंने कहा- एक वेबसाइट है, वहाँ पे ऐसे बहुत सी कहानियाँ छपती हैं, मैं आपकी कहानी भेजूँगा, तो बहुत से लोग पढ़ेंगे।

वो बोली- अरे छोड़ न, तू अपना काम कर और मज़े ले, मेरी कहानी में क्या रखा है।
मगर मेरे ज़िद करने पर वो मान गई और बोली- किसी खाली दिन आना, फिर मैं तुमको सब बताऊँगी।

करीब एक महीना गुज़र गया, तब एक दिन जब मैं फिर सकीना बाजी के अड्डे पे गया तो वो उस वक़्त बैठी पेग लगा रही थी। दो लोग और भी बैठे थे, साथ में। सामने टेबल पर शराब की आधी बोतल, तीन गिलास भी आधे पिये हुये, सामने चिकन का सालन, तले हुये काजू, नमकीन, सलाद। पूरी महफिल सजी थी, मुझे अपने सामने बैठा कर काजू की प्लेट मेरी तरफ बढ़ा कर बोली- पूछ,
क्या पूछना चाहता है। आज तुझे सब बता दूँगी।

मैंने कहा- बस तब से शुरू हो जाओ, जब पहली बार किया।
मैंने कहा, तो वो जैसे कुछ सोचने लगी, फिर अपनी कहानी बताने लगी:

करीब 40 साल हो गए, तब मैं छोटी सी थी, मुझे याद है, अब्बू मुझे बहुत प्यार करते थे, उनकी जान थी मैं। वैसे तो अब्बू अम्मी को भी बहुत प्यार करते थे, मगर धीरे धीरे मैं ये बात जान गई कि अम्मी कोई अच्छी औरत नहीं थी। अब्बू का उनसे निकाह नहीं हुआ था, बल्कि अब्बू उसे कोई दर्दमारी मज़लूम समझ कर कहीं से खरीद कर लाये थे।
पहले तो सब ठीक ठाक चल रहा था, मगर जैसे जैसे मैं बड़ी होती गई, अम्मी को मैं उनकी बेटी की बजाए एक ऐसा साइन किया हुआ चेक नज़र आती थी जिसे वो कभी भी कैश करवा सकती थी। और इसी वजह से अम्मी और अब्बू में अक्सर झगड़े भी होते है।

मुझे भी ये बात बुरी लगती थी इसीलिए मैं अब्बू के साथ ही ज़्यादा प्यार करती थी। मगर एक बार हमारे गाँव में कोई बीमारी फैली, और हम सब को गाँव छोड़ कर किसी और शहर में जाना पड़ा। मगर उस बीमारी का बीज मेरे अब्बू के सीने में भी फूट गया, और देखते देखते कुछ ही दिनों में अब्बू हमे छोड़ कर चले गए।
उनके जाते ही हमारे घर में तो खाने के लाले पड़ गए, क्या करते कहाँ जाते!

किसी ने अम्मी को सलाह दी कि लखनऊ चले जाओ, वहाँ आप दोनों का कोई न कोई इंतजाम तो हो ही जाएगा।

अम्मी मुझे लेकर लखनऊ आ गई। पहले कुछ दिन तो ठीक रहा, मगर धीरे धीरे हमारे घर में गैर मर्दों का आना जाना बढ़ गया। दो कमरों का छोटा सा घर, एक कमरे में मैं होती तो दूसरे कमरे में अम्मी को कोई नोच रहा होता। कभी अम्मी के चेहरे पर काटने के दाग होते तो कभी छाती पर, कभी कभी तो अम्मी के मुँह से खून भी निकलता देखा मैंने। मगर जो भी था, हमारे घर का चूल्हा जल उठा था।

एक दिन मैं रसोई में दोपहर का खाना पका रही थी। तभी एक आदमी अंदर आया, दारू में धुत्त और मुझे घूरने लगा। मैं डर गई। कुछ देर मुझे घूर कर वो चला गया। फिर उसने अम्मी को जाकर कुछ कहा।
अम्मी ने मुझे आवाज़ लगाई, मैं उठ कर डरते डरते अम्मी के कमरे में गई, जबकि मैं वहाँ नहीं जाती थी, सिर्फ सुबह सुबह साफ सफाई करने जाती थी।

मैंने अंदर जा कर देखा, शराब की बोतल और गिलास से भरे टेबल के परे अम्मी सोफ़े पर बैठी थी, बिल्कुल नंगी। एक मर्द बिस्तर पर लेटा था, वो भी बिल्कुल नंगा था। जो मर्द मुझे रसोई में देख कर गया, था, वो अभी ठीक ठाक कपड़े पहने था।
मैं आकर अम्मी के पास खड़ी हो गई- जी अम्मी?
मैंने कहा तो वो लेटा हुआ मर्द भी उठ खड़ा हुआ।

इतना मोटा और काला औज़ार उसका, मैं तो देख कर ही घबरा गई। उस नंगे मर्द ने मुझे बुलाया- इधर आओ, इधर बिस्तर पे बैठो।
मैं थोड़ा सा आगे तो बढ़ी पर बेड पर नहीं बैठी। मुझे खुद इस माहौल में शर्म आ रही थी, जब दो नंगे लोगों के आगे मैं खड़ी थी, जिनमे एक मेरी माँ थी। मैं ये भी सोच रही थी कि अम्मी कितनी बेशर्म है, कितनी बेहयाई से नंगी बैठी शराब के गिलास को पकड़े बैठी उनकी बकवास सी बातों पर हंस रही थी।

उस आदमी ने मुझे गौर से देखा और बोला- सक्कू, माल पसंद है, जा बेटा, तू जा!
मैं जाने लगी, तो अम्मी बोली- अभी तक तो इसको किसी मर्द ने हाथ भी नहीं लगाया, 25000 लूँगी इसकी नाथ उतरवाई के!

मैं बाहर आ गई, मगर इतना मुझे पता चल गया कि मेरा सौदा हो चुका है। पहले मैंने सोचा, नहीं मुझे ये सब काम नहीं करना, मैं यहाँ से भाग जाती हूँ। मगर भाग कर जाऊँगी कहाँ। जहां भी जाऊँगी, वहाँ मुझे किसी न किसी और भेड़िये ने नोच खाना है।

मैंने बहुत मिन्नत की, बहुत फरियाद की अल्ला मियां से… मगर मेरी फरियाद शायद वहाँ तक पहुंची ही नहीं।

अगले दिन अम्मी ने मुझे बहुत सुंदर कपड़े ला कर दिये, मुझे नहला धुला कर बड़ा सुंदर तैयार किया। मैंने मन ही मन रो रही थी, और कुछ भी नहीं कर पा रही थी, गुस्सा मेरे चेहरे पर था।
मैंने अम्मी से कहा- अम्मी, क्या तुमने मुझे उस आदमी के पास बेच दिया है?
अम्मी बोली- अरे धत्त, ऐसे नहीं कहते। अब तू जवान हो गई है, सारे घर का बोझ अब मैं कैसे उठा सकती हूँ, तुम्हें भी तो मेरा हाथ बटाना होगा। तू ये समझ आज से तू कमाने लगी है, ये तेरी नौकरी का पहला दिन है।

मैंने कहा- मैंने ये नौकरी नहीं करनी, मुझे पढ़ा लिखा कर किसी दफ्तर में नौकरी लगवा दो। ये तुम्हारे वाला गंदा काम मुझे नहीं करना।
तो अम्मी बोली- गंदा काम क्या है, सारी दुनिया करती है। तेरे बाप ने यही गंदा काम किया तो तू पैदा हुई थी, समझी। अब नखरे छोड़, और आराम से अपना काम संभाल। वरना, धंधे में तो मैं तुझे हर हाल उतार ही दूँगी, तू माने या न माने।

मैं रो पड़ी मगर अम्मी ने मेरे एक चांटा रसीद किया और मुझे डरा कर चुप करवा दिया।

थोड़ी देर बाद वो दोनों लोग आ गए, उस मोटे काले गैंडे ने आते ही अम्मी को 25000 रुपये दिये, और 1000 बख्शीश भी दी। अम्मी तो जैसे झूम उठी। झट से अलमारी से शराब के चार गिलास, दारू की बोतल सब निकाल कर टेबल पर रख थी।
आज तीन नहीं चार गिलास बने, शराब के, एक मुझे भी दिया गया। मैंने नहीं पिया पर उन सब ने पिया।

उस काले गैंडे ने अपने कपड़े खोले और सिर्फ एक चड्डी में वो बेड पे जाकर बैठ गया। दूसरे आदमी ने अम्मी के साथ नोच खसोट शुरू कर दी, कभी वो अम्मी को चूमता,कभी उसकी छाती दबाता। अम्मी भी बेशर्मो की तरह अपनी साड़ी का पल्लू नीचे गिरा कर बैठी थी, जिसमें से उसके बड़ी बड़ी गोरी गोरी छातियाँ आधी से ज़्यादा नंगी दिख रही थी।

मेरे मन में लाखों तूफान चल रहे थे, मैं बहुत डरी हुई थी कि पता नहीं आज मेरे साथ क्या होगा। एक एक गिलास दारू का और पीने के बाद, उस आदमी ने पहले मेरे सामने ही अम्मी को नंगी किया और फिर खुद भी नंगा हो गया। गंदमी रंग का वो साधारण से जिस्म का मालिक, मगर कोलतार जैसा काला और थोड़ा सा टेढ़ा सा लंड उसका।
अम्मी ने देखा तो उस आदमी ने इशारा किया और अम्मी उसके पाँव के पास बैठ कर उसका लंड चूसने लगी।
छी… कितनी गंदी हरकत। कैसे कोई किसी अंजान आदमी के गंदे से, सड़े से लंड को अपने मुँह में लेकर ऐसे चूस सकती है, जैसे वो कोई मिठाई हो।
मगर अम्मी चूस रही थी।

तभी मुझे एहसास हुआ, जैसे किसी ने मेरी पीठ पर हाथ फेरा हो।
ये वही काला आदमी था। मैं सिहर गई और उठ कर खड़ी हो गई। उस आदमी ने मेरा हाथ पकड़ा और अपने पास खींच कर बैठा लिया।
मैंने बड़ी मजबूर निगाहों से अम्मी को देखा, मगर वो अपने उस लोलीपोप को चूसने में लगी थी।
उस काले आदमी ने मुझे कहा- अरे अभी तक तुम इसे लिए बैठी हो, पियो इसे।
मैंने मना किया, पर उसने वो गिलास मेरे मुँह से लगा दिया और मुझे पिलाने लगा। कितना गंदा स्वाद, कड़वा, बदबूदार। मैं सोचती थी, पता नहीं लोग शराब कैसे पी लेते हैं। उसने वो गिलास मुझे पिला दिया, मुझे बहुत बुरा लगा, मगर थोड़ी ही देर में जो चीज़ मेरे पेट में गई थी, उसने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया, मैं जैसे सुन्न सी हो गई, आस पास क्या हो रहा है, मुझे कुछ होशो हवास नहीं रहा।

मैं सब देख रही थी, सुन रही थी, मगर मुझे समझ कुछ नहीं आ रहा था। मैंने देखा उस आदमी ने अपनी चड्डी भी उतार दी, और अपना काला, लंबा सा लंड वो मेरी तरफ लहरा रहा था। इतने में अम्मी ने थोड़ी से शराब और मेरे गिलास में डाल दी और वो भी मेरे हलक से उतर गई। मैं तो बिल्कुल जैसे हवा में उड़ रही थी। मैं बिस्तर पर गिर गई। उस काले आदमी ने पहले मेरा दुपट्टा उतार दिया, और फिर मेरे नाक में लगी नथ उतार दी।

मुझे इतना तो याद है कि उस आदमी ने खुद मेरे सारे कपड़े उतारे, मगर उसके बाद मैं इतना नशे में डूब गई कि मेरे साथ क्या हुआ, मुझे कुछ पता नहीं चला।
आधी रात के बाद मैं जब उठी, मुझे होश आया, तो मैंने अपने आस पास देखा। अम्मी एक तरफ फर्श पर ही नंगी गिरी पड़ी। दो लोग और भी बिल्कुल नंगे लेगे पड़े थे, एक मेरे साथ बेड पे, दूसरा नीचे फर्श पे। मगर ये लोग कोई और थे, दोपहर वाले नहीं थे।

मैं उठ कर बैठी तो मुझे तेज़ दर्द हुआ, मैंने अपने नीचे हाथ लगा कर देखा तो वहाँ खून खून हो रहा था। बड़ी मुश्किल से मैं उठ कर गुसलखाने तक गई। अंदर जा कर मैंने पहले पेशाब किया, पेशाब भी जैसे तेज़ाब था, दर्द के साथ आया।
फिर मैं नहाई और नहा कर बिना कोई कपड़ा पहने नंगी ही अपने कमरे में वापिस आई। अब मेरे पास कुछ भी नहीं बचा था, जिसे मैं संभाल कर रख सकती थी, मैं लुट चुकी थी। मैंने कमरे में जा कर रोशनी जला कर शीशे में अपने आप को देखा।
मेरे छोटे से सीने पर बहुत जगह, दाँत से काटने के निशान थे, पेट पर, कमर पर, जांघों पर हर जगह जैसे मुझे किसी ने चबा डाला हो।

मैं रोई, बहुत रोई, बहुत बहुत रोई, पता नहीं कितनी देर मैं रोती रही और रोते रोते ही मैं सो गई।

अगले दो दिन अम्मी ने मुझे बड़ा प्यार किया, खूब अच्छे कपड़े ला कर दिये, बढ़िया बढ़िया खाने को दिया।
मैंने कहा भी कि अम्मी मैं ये गंदा काम नहीं करूंगी।
मगर दो दिन बाद जैसे अम्मी ने सारे घर की ज़िम्मेदारी मुझे पर ही डाल दी हो। अब जो भी आता, वो अम्मी को नहीं, मुझे ही मांगता।

कुछ ही दिनों में हमने अपना घर बदल कर नया और बढ़िया घर लिया… मेरी कमाई का घर। अब अम्मी ने और भी कुछ औरतों और लड़कियों को अपने घर में बुला लिया, और घर क्या पूरा कोठा ही खोल लिया।
वो दिन और आज का दिन, लोग आते जाते रहे, इस घर में रंडियाँ आती जाती रही मगर मैं वहीं थम गई, मेरी ज़िंदगी वहीं थम गई।

इसी मोहल्ले के लोग कोई छुप छुप कर कोई खुले आम मेरे पास आते, और कोई अपनी बीवी का गुस्सा, कोई अपनी माशूक का गुस्सा, या कोई अपने अकेलेपन को दूर करता और चला जाता।
इन्हीं हजारों लोगों में तेरे दादा, अब्बा, चाचा, उनके लड़के, और बहुत से रिश्ते नातेदार भी यहाँ आए और देख अब तू आया है अपने कुनबे का तीसरी पीढ़ी।

मैं उसके बाद वहाँ नहीं बैठ पाया, वहाँ से उठ कर चला आया। मुझे ऐसे लग रहा था, जैसे इतना दर्द पहली बार में शायद मोहल्ले की जान सकीना बाजी को नहीं हुआ होगा, जितना उनकी कहानी सुन कर मुझे हुआ।
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